ग्राउंड जीरो से एक रिपोर्ट : बदहाली से खुशहाली की ओर छत्तीसगढ़ के ईरानी

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मिला नया आशियाना, तो चेहरों पर आयी रौनक
ईरानी डेरे के 112 परिवारों पांच सौ सदस्यों के लिए बनी एक नई कॉलोनी
रेल्वे पटरी किनारे की झुग्गी बस्ती के तंग माहौल से मिली मुक्ति
सीसी रोड, बिजली, पानी की सुविधाओं से परिपूर्ण है
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ईरानी कॉलोनी

कई पीढि़यों पहले हजारों किलोमीटर दूर ईरान से भारत और फिर इस देश के मध्यवर्ती राज्य छत्तीसगढ़ की धरती पर आए ईरानियों की घुमंतू जिंदगी को गुजर-बसर के लिए अब एक स्थायी बसाहट मिल गई है। उनका एक जत्था करीब एक सौ साल पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर आया था, जहां आमापारा में ये लोग घोड़े आदि बेचने का कारोबार करते थे। रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं था। लिहाजा ये ईरानी परिवार यहां पंडरी इलाके में रायपुर से धमतरी जाने वाली छोटी लाइन की रेलवे पटरी के किनारे झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहने लगे। अब लगभग एक सौ बरस की लम्बी बदहाल जिंदगी से निकलकर ये लोग एक खुशहाल भविष्य की ओर बढने लगे हैं। कालोनी के ईरानी परिवारों का कहना है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी सरकार की विशेष पहल से ही यह मुमकिन हो पाया है।
इस डेरे के 112 परिवारों के लगभग 500 सदस्यों को झुग्गी बस्ती के तंग माहौल से मुक्ति मिलने पर अब एक साफ-सुथरी बसाहट में स्वयं के पक्के मकान में रहने का एक सुकून भरा अहसास होने लगा है और उनके चेहरों पर रौनक आ गयी है। सिर्फ तीन महीने पहले तक ये परिवार यहां पंडरी के पुराने रेल्वे स्टेशन के पास पटरी के किनारे झुग्गियों में रहा करते थे। उनकी झुग्गी बस्ती को ‘ईरानी डेरे’ के नाम से पहचाना जाता था। मकान चाहे छोटा हो या बड़ा अपना मकान अपना होता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य के अनुरूप मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में आवास विहीन या झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब परिवारों को वर्ष 2022 तक पक्के मकान दिलाने का आवास क्रांति का विशेष अभियान शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री आवास योजना सहित केन्द्र और राज्य की विभिन्न आवासीय परियोजनाओं के तहत इसके लिए काम तेजी से चल रहा है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार की बीएसयूपी योजना के तहत छत्तीसगढ़ सरकार और नगर निगम रायपुर के सहयोग से ईरानी परिवारों को शहर से लगे हुए दलदल सिवनी के पास नगर निगम के वार्ड नम्बर 26 (कुशाभाऊ ठाकरे वार्ड) में पक्के मकानों की एक साफ-सुथरी आवासीय कॉलोनी की सौगात मिली है, जहां सीसी रोड, बिजली और पेयजल के लिए सार्वजनिक नल आदि की भी सुविधाएं दी गई हैं। इस नवनिर्मित ईरानी कॉलोनी का नामकरण एकात्म मानववाद के प्रवर्तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर किया गया है। बच्चे स्कूलों से हंसते-खेलते लौटकर यहां की साफ-सुथरी सीमेंट की सड़कों पर मस्ती से क्रिकेट खेलते नजर आते हैं। रेल्वे पटरी की झुग्गी बस्ती की तंग गलियों में ये बच्चे खेलने के लिए भी तरस जाते थे। झुग्गी बस्ती में जिन परिवारों को रसोई का कमरा भी नसीब नहीं था, अब उन्हें नई बसाहट के अपने मकानों में स्वच्छ किचन भी मिल गया है, जहां निश्ंिचत होकर वे अपने परिवार की रसोई बनाती हैं। किचन में रसोई गैस के चूल्हे और सिलेंडर, स्टेनलेस स्टील के बर्तन आदि व्यवस्थित रूप से रखने की पर्याप्त जगह है। कमरे में सीलिंग पंखा भी लगा हुआ है। एक निम्न मध्यम वर्गीय मेहनतकश परिवार को आज के युग में औसत पारिवारिक जीवन के लिए जितनी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है, उनमें से अधिकांश सुविधाएं इन घरों में भी देखी जा सकती है।
पहले उनकी झुग्गी बस्ती के कच्चे घरों में आंगन या खुली जगह नहीं थी। इस वजह से उनके लिए कपड़े धोना और सुखाना भी बहुत मुश्किल था। अब नई बसाहट में इसके लिए अर्पाटमेंट के बाहर काफी जगह है। प्रदूषित वातावरण से निकलकर मई 2018 में स्वच्छ वातावरण वाली इस कॉलोनी में आने पर इन परिवारों के बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के चेहरों पर अब हमेशा मुस्कान नजर आती है। कॉलोनी में इन परिवारों को छह अलग-अलग ब्लॉक्स में फ्लैट दिए गए हैं। प्रत्येक फ्लैट में किचन, हाल और लेट-बाथ की सुविधा है। बिजली की बेहतर और निरंतर आपूर्ति के लिए ट्रांसफार्मर भी लगवाया गया है।
छोटी लाइन की रेल पटरी के किनारे ईरानी डेरा के नाम से बनी झुग्गी बस्ती की तंग गलियों में तो सांस लेना भी मुश्किल होता था। अब नई कॉलोनी के खुले वातावरण में खुली और ताजी हवा के झोंके इनकी जिन्दगी को नई ताजगी और स्फूर्ति दे रहे हैं। इन परिवारों के पुरूष सदस्य शहर के मालवीय रोड के फुटपाथ पर चश्मा और घड़ी आदि बेचकर परिवार का खर्च चलाते हैं। पचासों साल से इस कारोबार के जरिए उनकी जिन्दगी चल रही है। रेल पटरी के किनारे झुग्गी बस्ती में जिन्दगी का अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद करते हुए उन लोगों ने कई दशक कैसे बिता दिए, पता ही नहीं चला। ये लोग अपने घरों में फारसी भाषा में बातचीत करते हैं। पीढियों से रायपुर शहर में रहने के कारण हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भी अच्छी तरह जानते हैं। लगभग 75 वर्ष की शाहजादी बानो कहती हैं-पंडरी के कच्चे मकान में बरसात से बचने के लिए हर साल उन्हें अपने खपरैल के छप्पर को प्लास्टिक शीट से ढॅ़कना पड़ता था। करीब 50 से 60 साल इसी तरह गुजार दिए। रमन सरकार ने इस नई कॉलोनी में उन्हें बीएसयूपी योजना के तहत पक्का मकान दिया है, तो अब यह समस्या नहीं रह गई है। बुजुर्ग शाहजादी बानो इसके लिए भावुक होकर कहती हैं-खुदा सलामत रखे रमन सरकार को। पटरी किनारे की झुग्गी बस्ती में रहकर कठिन जीवन संघर्ष के बीच कई ईरानियों ने अपने घर परिवार को आत्मनिर्भर भी बनाया। इसी ईरानी डेरे में जिन्दगी के संघर्ष की आंच में तपकर सुलेमान ईरानी और रूस्वा ईरानी जैसे उर्दू के मशहूर शायर भी हुए। इनमें से अली सज्जाद ‘रूस्वा ईरानी’ को छत्तीसगढ़ सरकार ने उर्दू भाषा और साहित्य की सेवा के लिए हाजी हसन अली सम्मान के रूप में राज्य अलंकरण से सम्मानित किया था। मरहूम शायर रूस्वा ईरानी ने कभी लिखा था-
दो रोटियों पे जिन्हें इत्मीनान होता है,
उन्हीें के कदमों तले आसमान होता है।
बहुत से लोग हैं, जिनके सरों पर छत भी नहीं,
वो खुशनसीब हैं, जिनका मकान होता है।
वास्तव में ईरानी डेरे के इन मेहनतकशों ने अपनी मेहनत से अपने-अपने परिवारों के लिए रोटियों का इंतजाम तो पहले ही कर लिया था, लेकिन अब वे सचमुच बेहद खुशनसीब हैं क्योंकि सरकार की संवेदनशीलता से उन्हें स्वयं का मकान मिल गया है। नौजवान जाफर अली ने पंडरी की झुग्गी में रहकर राजधानी के गुजराती स्कूल से बारहवीं पास किया। वे अब नई बसाहट के अपने पक्के मकान में रहते हैं और अपनी कॉलोनी के स्कूली बच्चों को निःशुल्क ट्यूशन भी पढ़ाते हैं। वो कहते हैं-ईरानी जमात मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी सरकार की हमेशा आभारी रहेगी, जिन्होंने हमें जिन्दगी को सलीके से जीने का एक अच्छा माहौल दिया है। सलाम हुसैन ईरानी एक अच्छे शायर और कव्वाल हैं। सरताज अली पहलवान हैं और दो बार क्रमशः वर्ष 1979 तथा वर्ष 2004 में रायपुर शहर में आयोजित कुश्ती प्रतियोगिता में चौम्पियन रह चुके हैं। पुरानी झुग्गी बसाहट में रहते हुए उन्होंने पहलवानी भी सीखी और अब शहर के अलग-अलग हिस्सों में दूसरों को कुश्ती के दांव-पेंच सिखा रहे हैं।
सरताज अली कहते हैं- पंडरी की पुरानी झुग्गी बस्ती में ही वो पले-बढ़े, जहां हालत ऐसी थी कि अगर सिर नगर निगम की जमीन पर था, तो धड़ रेल्वे की जमीन पर। एक अनिश्चित भविष्य को लेकर उन्होंने बरसों-बरस अपने दिन किसी तरह गुजारे। अब रमन सरकार से मिली इस नई कॉलोनी में काफी सुकून है। उनकी चाहत है कि कॉलोनी में अखाड़े की व्यवस्था हो जाए, ताकि वहां के युवाओं को वह कुश्ती सिखाकर अपने जैसा पहलवान बना सकें। ईरानी जमात के शायर मोहसिन अली ‘सुहैल’ कहते हैं -पूर्वजों की धरती ईरान से अब इन परिवारों का कोई रिश्ता लगभग नहीं के बराबर रह गया है। ये लोग भारत की धरती और छत्तीसगढ़ की माटी में रच -बस गए हैं। इन लोगों का कहना है कि जितना प्यार और सुकून हमें भारत में और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में मिलता है, उसे छोड़कर दुनिया में और कहीं भी जाने और रहने का जी नहीं करता। हमारी जिंदगी बदहाली से खुशहाली की ओर बढ़ रही है।
नई कालोनी के नन्हें ईरानी बच्चे स्कूली पढ़ाई के लिए राजातालाब और अन्य वार्डों में जाते हैं। माता-पिता उन्हें ऑटो-रिक्शे में या खुद की दोपहिया गाड़ी में वहां पहुंचाते हैं। हासिम चौथी कक्षा में पढ़ता है। वह शहीद भगत सिंह स्कूल का छात्र है। सादिक अली राजातालाब के नूरानी स्कूल में पांचवीं कक्षा में हैं। नन्हीं आशिया दूसरी कक्षा में है और वह भी कॉलोनी के बच्चों के साथ यहां से राजातालाब के नूरानी स्कूल जाती है। सानिया जेहर पीपी-2 में पढ़ती है। इन बच्चों में से किसी में डॉक्टर बनने की तमन्ना है तो किसी में इंजीनियर और कोई क्रिकेटर भी बनना चाहता है। सबकी आंखों में एक सुनहरी जिन्दगी का सपना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ईरानी कॉलोनी में स्वयं का मकान मिलने की खुशी हर ईरानी परिवार में देखी जा सकती है। काम पर निकलने के बाद हर सुबह 9 बजे से देर शाम तक घण्टों फुटपाथ पर खड़े रहकर चश्मा और बेल्ट बेचने के कारोबार के बाद जब ईरानी पुरूष इस नई कालोनी के अपने घरों में लौटते है, तो उन्हें एक सुकून भरी जिन्दगी का एहसास होने लगता है। शायद उनके लिए ही शायर अहमद महफूज ने कभी लिखा था –
सुना है शहर का नक्शा बदल गया महफूज।
तो चल के हम भी जरा अपने घर को देखते हैं।।
नवनिर्मित ईरानी कालोनी के रहवासी निवासी सरताज अली कहते हैं- रमन सरकार ने हमारे लिए बिजली, पानी और पक्की सड़क के साथ पक्के मकानों की व्यवस्था कर दी है। हम लोग डॉ. रमन सिंह के शुक्रगुजार हैं और हमेशा रहेंगे। उन्होंने कहा- कॉलोनी के पुरूषों को रोजी-रोटी कमाने के लिए हर दिन सुबह लगभग 9 बजे यहां से करीब दस किलोमीटर दूर मालवीय रोड जाना पड़ता है। बच्चों को भी स्कूल के लिए यहां से दूर जाना पड़ता है। उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए अपनी कॉलोनी तक सिटी बस सेवा का विस्तार करने का सुझाव दिया।

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