छत्तीसगढ़ी न्यूज़: इस गांव में पेड़ काटने पर पांच हजार के जुर्माने का प्रविधान, अब नजर आ रही है सिर्फ हरियाली

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भिलाई। दुर्ग और बेमेतरा जिले की सीमा से लगे एक गांव बोहारडीह में वर्ष 1995 से कुल्हाड़ी बंद का नियम लागू है। यहां पर पेड़ काटने की सख्त मनाही है। 25 साल पहले गठित हुए ग्राम समिति ने इस नियम का पालन करवाने के लिए पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी निर्धारित किया।

जिसके भय से लोगों ने पेड़ काटना बंद कर दिया। इस नियम के चलते लोगों में जागरूकता आई और अब गांव में सिर्फ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। गांव के करीब 100 एकड़ के क्षेत्र में विभिन्ना प्रजातियों के करीब 10 हजार पेड़ उग चुके हैं।

वर्ष 1995 के पहले तक गांव का कोई भी व्यक्ति अपनी जरूरत के लिए किसी भी हरे पेड़ को काट देता था। इसके चलते धीरे-धीरे पेड़ कम होने लगे थे। तेजी से कम होती हरियाली से चिंतिग गांव के लोगों ने एक ग्राम समिति का गठन किया। समिति की बैठक में ये निर्णय लिया गया कि अब कोई भी किसी भी पेड़ को नहीं काटेगा।

खाना बनाने के लिए गोबर के कंडे और खेत के पैरावट का इस्तेमाल किया जाएगा। यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है तो उसे पांच हजार रुपये का अर्थदंड देना होगा। वर्ष 1996 में गांव के एक व्यक्ति ने इस नियम को तोड़ा।

जिसके बाद उसे अर्थदंड देना पड़ा। इसके बाद से आज तक वहां के किसी भी व्यक्ति ने हरे पेड़ पर कभी भी कुल्हाड़ी नहीं चलाई।

आंधी-तूफान में गिरे पेड़ की लकड़ी होती है नीलाम

गांव में अब हजारों की संख्या में पेड़ उग चुके हैं। कभी आंधी-तूफान के चलते यदि कोई पेड़ धराशायी हो जाता है तो ग्राम समिति उसकी लकड़ी को गांव में ही नीलाम करती है। नीलामी के पैसों से गांव में विकास कार्य कराए जाते हैं। बोहारडीह, ग्राम पंचायत खंघारपाट का आश्रित गांव है। इस गांव में सिर्फ वार्ड है और यहां की कुल आबादी 400 से 500 के बीच है।

कम वार्ड वाला गांव होने के कारण इसलिए यहां के लोगों को ग्राम पंचायत में प्रतिनिधित्व का बड़ा अवसर नहीं मिलता। हर कार्य के लिए उन्हें ग्राम पंचायत खंघारपाट पर आश्रित रहना पड़ता है। इसलिए लकड़ी की नीलामी से होने वाली आय से बोर खनन, तालाब पचरी निर्माण जैसे कार्य कराए जाते हैं।

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