घट रही बेटियों की जन्मदर, दुर्ग जिले में 1000 बेटों पर 812 बेटियां, जांजगीर-चांपा की स्थिति सबसे खराब, वहां पर यह दर 795

दुर्ग जिले में गर्ल चाइल्ड बर्थ का आंकड़ा चौकाने वाला है. भारत सरकार द्वारा जारी फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक साल के हिसाब से औसत निकाला गया है. इसमें जितने समय में 1 हजार लड़कों का जन्म हो रहा है, उतने समय में 812 लड़कियां पैदा हो रही हैं. 27 जिलों में जांजगीर-चापा के बाद सबसे खराब स्थिति दुर्ग की है.

जांजगीर-चांपा में जितने समय में 1 हजार लड़के पैदा हो रही हैं, उतने समय में 795 लड़कियां जन्म ले रही हैं. रायगढ़ में दुर्ग जैसी स्थिति है. रायगढ़ में 1000 लड़के जितने समय में जन्म ले रहे हैं, उतने समय में 812 बच्चियां पैदा हो रही हैं. कुल पांच सर्वे में अंतिम सर्वे की रिपोर्ट 2021 में जारी हुई है. प्रदेश के 27 जिलों की इस रिपोर्ट के अनुसार 12 जिलों में गर्ल चाइल्ड बर्थ की दर कम है. रिपोर्ट हाल में जारी की गई है.

गर्ल चाइल्ड बर्थ रेट कम होने की वजह 1- भ्रूण जांच और गर्भपात नहीं थम रहे : जिले जिलों में गर्भ में पल रहे बच्चे की जांच की जितनी अधिक व्यवस्था है. उन जिलों में गर्ल चाइल्ड बर्थ का आंकड़ा पुरुष बच्चों की तुलना काफी कम है. जाहिर है कि ढेर सारे सख्त कानून के बाद भी उन जिलों में गर्भ में पल रहे बच्चे की जांच और अवैध गर्भपात नहीं थम रहा है. इसी वजह उन जिलों में बच्चियों की संख्या कम हो रही है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़े हैरान करने वाले हैं. इन आंकड़ों का परीक्षण कराया जाएगा. साथ ही जहां-जहां गर्ल चाइल्ड बर्थ के आंकड़े ब्वाय चाइल्ड के आंकड़ों से काफी कम है, उन जिलों के सीएमएचओ को अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर और अस्पतालों पर कार्रवाई के निर्देश देंगे.

ब्वाय चाइल्ड की तुलना में गर्ल चाइल्ड ​बर्थ के आंकड़े भयावह और चिंताजनक है. स्वास्थ्य विभाग को जिले में संचालित अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर और गर्भपात केंद्रों की जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए. भ्रूण हत्या करने वालों पर एक्शन लें.

2- मेल चाइल्ड पहली ख्वाइश लोगों में अब भी है: बदलते परिवेश में महिलाएं भले हर क्षेत्र में पुरुषों को कड़ी टक्कर देने लगी है. इसके बाद भी अधिकतम लोगों की पहली ख्वाइश पुरुष बेबी की बनी है. इसी चाहत में लोग नैतिक और अनैतिक निर्णय ले रहे हैं. सरकारी एजेंसियों के ढुल-मुल रवैये के कारण बच्चियां गर्भ में ही मार दी जा रही हैं. नक्सल प्रभावित क्षेत्र में ऐसा करने संसाधन कम है.

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